Friday, October 21, 2011

आज के महात्मा अन्ना : राजीव शंकर शर्मा,स्टेशन रोड ,तिलहर (शाहजहांपुर ) उप्र

कांग्रेस पार्टी अन्ना हजारे को महात्मा कहे जाने पर तीव्र आक्रोश व्यक्त कर रही है किन्तु कांग्रेस का आक्रोश राष्ट्र का जनमानस की समझ से परे है .राष्ट्र का जनमानस कांग्रेसी पुरोधाओं से जानना चाहता है कि यदि अन्ना हजारे महात्मा नहीँ है तो क्या कांग्रेस ए राजा ,कनीयोझी, सुरेश कलमाड़ी , शीला दीक्षित सरीखों को महात्मा मानती है. अन्ना हजारे को महात्मा न मानने को लेकर दिया गया कांग्रेस का यह तर्क भी कुतर्क की श्रेणी मेँ ही रखा जा सकता है कि महात्मा राष्ट्र मेँ केवल बापू को ही माना जा सकता है .निश्चित तौर पर राष्ट्रपिता गांधी महात्मा की श्रेणी मेँ आते हैं किन्तु इसका यह भी मतलब नहीं कि गांधी जी से पूर्व या उनके बाद राष्ट्र मेँ किसी अन्य को महात्मा की उपाधि नहीं दी जा सकेगी.स्वामी विवेकानन्द ,रामकृष्ण परमहंस , महर्षि दयानन्द , पं.मदनमोहन मालवीय,बाल गंगाधर तिलक ,लाला लाजपत राय व नेता जी सुभाष चंद्र बोस को भी महात्मा की ही श्रेणी मेँ रखा जाएगा.

20.10.2011,वृहस्पतिवार
पाठकनामा,दैनिक जागरण. बरेली ,उप्र


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Wednesday, October 19, 2011

शाकाहारी बिना भजन अधूरा:करुणाकांत मिश्रा

बरेली मण्डल मेँ इस वक्त गांव गांव व नगर नगर जयगुरुदेव के भक्त 'शाकाहारी बनो' आन्दोलन मेँ लगे हुए हैँ.मानव शरीर बड़े यत्नों से प्राप्त होता है.दुनियादारी के काम मेँ भी लगकर मनुष्य प्रभु भक्ति मेँ रम सकता है.यही उसे पशु पक्षी की श्रेणी से अलग करता है. मानव के कर्म के अनुसार ही उसे अगला जन्म मिलता है.झूठ बोलने हिंसा करने और मांस खाने व शराब पीने से समाज दूषित हो रहा है.


संदेशवाहक करुणाकांत मिश्र सत्राह अक्टूबर को जीआईसी के खेल मैदान मेँ भक्तोँ को संबोधित कर रहे थे.जीआईसी ग्राउंड मेँ जयगुरुदेव के भक्त सुबह से ही उमड़ने शुरु हो गे थे.धीरे धीरे कर मैदान के अंदर व बाहर जयगुरुदेव के अनुयायियों का तांता लग गया था.संदेशवाहक करुणाकांत मिश्र ने लोगों से ईमानदारी से कमाने पर जोर दिया.साथ ही कहा कि नेक नियत से काम करने मेँ ही बरकत है.बाबा जयगुरुदेव की अपील है कि सब शाकाहारी होँ.शाकाहारी होने का मतलब सिर्फ मांस मछली शराब आदि छोंड़ने मात्र से नहीं है साथ साथ उदारता,नम्रता,सेवा भाव भी आवश्यक है.निरन्तर मन मेँ भजन चलते रहना आवश्यक है.मन मेँ संसार रखना भक्तों का काम नहीं है.न दुख मेँ रहना भजन करँ

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Sunday, October 16, 2011

सजना के लिए सजना : करवा चौथ

भैयादूज,रक्षाबंधन पर्व की तरह मैं अभी करबाचौथ पर्व को दिल दिमाग से स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ.ये पर्व हमेँ पुरुष प्रधान समाज की देन नजर आ रहे हैँ.मैने सनातन धर्म के सम्बंध मेँ अपनी एक सोंच बना रखी है जो कि आज के पंथों को स्वीकार करने वालों से हट कर है.मानव सत्ता मेँ नरनारी का सम सह अस्तित्व है.दोनो के बीच समसंतुलन आवश्यक है.मानवसत्ता की उत्पत्ति से पूर्व आदम या शंकर से हब्बा या पार्वती का जन्म हम मान सकते हैं और यहां तक पुरुष को महत्वपूर्ण मान सकते हैं लेकिन इसके आगे मानवसत्ता के उदय के बाद मानवसत्ता मेँ कम से कम नरनारी के समसह अस्तित्व को स्वीकार करना ही चाहिए.फिर समाज में सुप्रबंधन व सत के स्थापन के लिए नारीशक्ति को मातृशक्ति मान कर ही हम मानवसत्ता को संस्कार के उच्च शिखर पर पहुंचा सकते हैँ.गौरबशाली भारत मेँ तो नारी को सम्मान स्थान देते हुए सिर्फ सन्तानोत्पत्ति के लिए ही काम का प्रयोग किया जाता था.श्रीअर्द्धनारीश्वरशक्ति पीठ ,बरेली,उप्र संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह 'भैया जी' का कहना है नारी को यदि पुरुष का सम्मान करना है तो वह अपना भाव व मनस निष्काम सेवा मेँ लगाये....

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